धान से बनी मजबूत सरकार धान के कारण चली गयी

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2018 के  विधानसभा चुनाव के घनघोर परिणाम और 15 साल पुरानी चवर वाले बाबा की सरकार की करारी हार के मूल कारण यूँ तो कई हैं लेकिन डॉ रमन की सौम्य छवि के वावजूद  धरातली औंधे मुंह उम्मीदों का गिरने की  मीमांसा में  सीधा सरल और सपाट उत्तर यही निकलता है कि ये सरकार धान के कारण बनी थी और धान के कारण ही चली गयी।
राज्य बनते ही भाजपा सरकार द्वारा सहकारी संस्थाओं पैक्स लैम्प्स के 1333 सहकारी उपअर्जन केंद्र से शुरू हुई व्यवस्था किसानों के लिए लाभकारी सिद्ध हुइ। शुरुआत 6 लाख टन से बढ कर यह 72 लाख मीट्रिक टन पर किसानों को धान उपार्जन की व्यवस्था किसानों के आर्थिक स्थिति में सुधार का प्रमुख कारण बनी। और यही एक प्रमुख  कारण भाजपा की सरकार के चुनाव जीतने का आधार भी बनता रहा। इसीलिए इस बार भी 18 लाख किसानों का भरोसा डॉ रमन और उनकी सरकार के नुमाइंदों को था। इस बीच भारी राजनीतिक दबावों के बीच धान बोनस और  समर्थन मूल्य 2100 की घोषणा हुई। बोनस के बाद सरकार को उम्मीद भी थी कि किसान इस बार इस बढ़े भाव और बोनस का प्रतिसाद देंगे।

Congress Manifesto 2018

लेकिन ऐसा हुआ नही। एन चुनावो सप्ताह भर पहले राहूल गांधी और राज्य के कांग्रेसी नेताओं ने लगातार खरीदी भाव धान का 2500 रु करने और उससे भी बड़ी किसानों की लोक लुभावन कर्जा माफी 10 दिन में कर देंगे कि घोषणा ने भाजपा के 65 प्लस के मंसूबों पर बुरी तरह से पानी फेर दिया। किसान वोट देने के बाद भी मौन थे, शायद उन्होंने बदलाव का निर्णय ले लिया था। जिस धान खरीदी से राज्य की देश मे पहचान बनी भाजपा की सरकार बनी, उसी धान में आकर्षक घोषणाओं ने भाजपा की सरकार गिरा दी।

Mahanadi Bhawan Raipur

मीमांसा करें तो यह वज्र हार केवल सरकार या राजनीतिक पार्टी की हार मात्र नही है, जनता का यह कठोर संदेश  उस सरकारी तंत्र के खिलाफ है, जो शायद अपना जनाधार खो रही थी। यह जनादेश मात्र राजनीतिक कारणों की परिणति नही है, बल्कि एक सौम्य सरल मुख्यमन्त्री के असोम्य आवरण में ढंक जाने का परिणाम है। उस अफसरशाही के असफल होने का परिणाम है, जिसे जनता, और छोटे बड़े जनप्रतिनिधियों से विनम्र व्यवहार नही कर पाने का प्रतिफल दे दिया गया।शायद नही, बल्कि स्पष्टतः, यह उस महानदी भवन और इंद्रावती भवन के असफल  होने का  भी परिणाम है।

विधानसभा चुनाव परिणाम के बाद मीडिया से बात करते हुये डॉ रमन सिंह

क्योंकि इस वज्र हार, जिसे कहें की सत्ताधारी पार्टी का सूपड़ा साफ हो गया इसकी जिम्मेदारी  मात्र निर्वाचित सत्ता दल की नही है, उसकी भी है  जिन्हे शासन प्रशासन चलाने की जिम्मेदारी दी गयी थी। बल्कि उस आवरण की भी ज्यादा है जिन्होंने इस राज्य के मुखिया को लगभग घेर कर रखा। जिस अफसरशाही के निरंकुश, और भ्र्ष्टाचार में लिप्त होने के लगातार आरोप आते रहे, लेकिन नेतृत्व ने ऐसी शिकायतों को नजर अंदाज कर दिया। लोग दूर होते गए अफसर और मंत्री ऊंचे उठते रहे। वास्तव में इस तरह के परिणाम सत्ता और कतिपय नौकरशाहों के नेक्सस या गठजोड़ बन जाने का परिणाम है।

सरकार में समन्वय और टीम बिल्डिंग जब कम हो जाती है तो यही परिणति होती है। नेताओं और जिलों में पदस्थ अफसरों में आम जनता को सुनने की आदत कम हो गयी। अफसर अपना मूल विभागीय दायित्व तो नही निभा पा रहे थे, बल्कि सरकारी तंत्र और नुमाइंदों के व्यवस्थापक ज्यादा बन गए थे। व्यवस्थापक हो जाने की परिणति जनता ने व्यवस्था कर दी। इसी तरह का असंतोष इकठ्ठा होता रहा उस बीच धान को लेकर राजनीति शुरू हो गयी। अफ़सरो की अदूरदर्शिता पूर्ण नीतियों ने छत्तीसगढ़ का हित उपेक्षा में रह गया। और यही हुआ जो सरकार धान से बनी थी धान के कारण चली गयी।

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